प्रतापपुर स्कूल में बैगलेस डे की अनूठी पहल: बच्चों ने स्वयं बनाई मिट्टी की गणेश मूर्तियां, गाजे-बाजे के साथ स्थानीय तालाब में किया विसर्जन

स्कूली बच्चों द्वारा स्थानीय परंपरा अनुसार गाजे बाजे के साथ स्व निर्मित गणेश मूर्ति का किया गया विसर्जन
अभय न्यूज मुंगेली/प्रतापपुर, 29 सितंबर 2026।
छत्तीसगढ़ स्कूल शिक्षा विभाग एवं माननीय शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव के निर्देशानुसार बच्चों को प्रदेश की सांस्कृतिक धरोहर और तीज-त्योहारों से जोड़ने के लिए हर शनिवार को ‘बैगलेस डे’ मनाया जा रहा है। इसी कड़ी में शासकीय पूर्व माध्यमिक शाला प्रतापपुर में ‘बैगलेस डे’ के अवसर पर बच्चों ने अपनी अनूठी प्रतिभा का प्रदर्शन करते हुए पर्यावरण के अनुकूल (इको-फ्रेंडली) गणेश मूर्तियों का निर्माण किया, जिनका पूरे विधि-विधान और हर्षोल्लास के साथ विसर्जन किया गया।
**बच्चों के हुनर को निखारने का जरिया बना ‘बैगलेस डे’**
विगत शनिवार को आयोजित बैगलेस डे के दौरान विद्यार्थियों को विभिन्न सामग्रियों से गणेश जी की मूर्तियां बनाने और गणेश उत्सव पर निबंध लेखन का कार्य सौंपा गया था। स्कूल के प्रतिभावान बच्चों ने अपने नैसर्गिक हुनर का परिचय देते हुए मिट्टी की छह बेहद आकर्षक और मनोहारी मूर्तियां बनाईं। बच्चों की इस कलात्मक सोच को निखारने और उनके भीतर छुपी प्रतिभा को सामने लाने में शिक्षा विभाग की यह बैगलेस डे योजना मील का पत्थर साबित हो रही है।

**परंपरा अनुसार गाजे-बाजे के साथ विसर्जन, उमड़ा जनसैलाब**
बच्चों द्वारा बनाई गई इन गणेश मूर्तियों को पूरे गणेश उत्सव से लेकर अनंत चतुर्दशी तक विद्यालय परिसर में ही स्थापित कर प्रतिदिन पूजा-अर्चना की गई। उत्सव के समापन पर स्थानीय परंपरा के अनुसार, गाजे-बाजे और ढोल-ताशों की गूंज के बीच बेहद उत्साहपूर्ण माहौल में भगवान श्री गणेश की मूर्तियों को विसर्जन के लिए ले जाया गया। स्कूली बच्चों ने नाचते-गाते हुए स्थानीय तालाब में बप्पा की मूर्तियों का विसर्जन किया।

**ग्रामीणों और शिक्षकों में दिखा भारी उत्साह**
इस अनूठे और पारंपरिक आयोजन को देखने के लिए बच्चों के साथ-साथ स्थानीय ग्रामीणों और अभिभावकों में भी भारी उत्साह देखा गया। इस गौरवमयी पल के साक्षी बनने के लिए संस्था के प्रधान पाठक, सभी शिक्षक-शिक्षिकाएं, मध्याह्न भोजन की रसोइया, स्वच्छता कर्मी और बड़ी संख्या में ग्रामीण जन उपस्थित रहे। यह आयोजन बच्चों को किताबी ज्ञान के साथ-साथ छत्तीसगढ़ की समृद्ध सांस्कृतिक परंपराओं से व्यावहारिक रूप से जोड़ने का एक सफल प्रयास रहा।

