छत्तीसगढ़ का पहली तिहार हरेली: हरियाली, खेती और लोकसंस्कृति का अनुपम उत्सव

अभय न्यूज मुंगेली| 12 अगस्त 2026
छत्तीसगढ़ की माटी, संस्कृति और कृषि जीवन से गहराई से जुड़ा हरेली तिहार प्रदेश का पहला प्रमुख लोकपर्व माना जाता है। सावन अमावस्या के अवसर पर मनाया जाने वाला यह पर्व इस वर्ष 12 अगस्त 2026 को मनाया जा रहा है। हरेली केवल उत्सव नहीं, बल्कि प्रकृति, खेती-किसानी, पशुधन, कृषि औजार और लोकपरंपराओं के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का पर्व है।
🌱 हरियाली से जुड़ा है हरेली का नाम
‘हरेली’ शब्द का संबंध हरियाली से माना जाता है। बारिश के मौसम में जब खेत-खार हरे-भरे हो जाते हैं, पेड़-पौधों में नई जान आ जाती है और धरती हरित चादर ओढ़ लेती है, तब किसान और ग्रामीण समाज हरेली के माध्यम से प्रकृति के प्रति आभार प्रकट करता है। यह पर्व खरीफ कृषि चक्र के महत्वपूर्ण चरण से भी जुड़ा हुआ है।

🚜 कृषि औजारों की पूजा
हरेली के दिन किसान अपने नांगर, बक्खर, कुदाली, गैंती, हंसिया, टंगिया, रापा सहित कृषि में उपयोग होने वाले औजारों को साफ-सुथरा कर उनकी पूजा करते हैं। आधुनिक समय में ट्रैक्टर और अन्य कृषि मशीनरी भी इस परंपरा का हिस्सा बन गई हैं।
कृषि औजारों की पूजा दरअसल उस श्रम और साधन के प्रति सम्मान है, जिसके माध्यम से किसान धरती से अन्न पैदा करता है।
🐄 पशुधन के प्रति सम्मान
छत्तीसगढ़ की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में बैल, गाय और अन्य पशुधन का विशेष महत्व रहा है। हरेली पर पशुओं को स्नान कराया जाता है और उनकी पूजा-अर्चना की जाती है। परंपरागत रूप से पशुधन के स्वास्थ्य और खेती की समृद्धि के लिए मंगलकामना की जाती रही है।
🌿 नीम और वनौषधियों की परंपरा
हरेली के साथ नीम और विभिन्न वनस्पतियों का भी विशेष संबंध है। ग्रामीण अंचलों में घरों और खेतों में वनस्पतियों का उपयोग लोकमान्यताओं और पारंपरिक ज्ञान के आधार पर किया जाता रहा है। इस परंपरा में प्रकृति और मानव जीवन के बीच गहरे संबंध की झलक दिखाई देती है।

🪵 गेड़ी है हरेली की खास पहचान
हरेली का नाम आते ही गेड़ी की याद आती है। बांस से बनी गेड़ी पर बच्चे और युवा गांव की गलियों में चलते और खेलते हैं। गेड़ी केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति की पहचान बन चुकी है। हरेली के दिन गांवों में गेड़ी चढ़ने की प्रतियोगिताएं और पारंपरिक खेल उत्सव में नई ऊर्जा भर देते हैं।
🏡 गांव की एकजुटता और लोकजीवन
हरेली सामाजिक सौहार्द का भी पर्व है। किसान, कारीगर, पशुपालक और ग्रामीण समुदाय मिलकर इस त्योहार को मनाते हैं। कृषि से जुड़े विभिन्न समुदायों और परंपरागत कारीगरों की भूमिका इस पर्व को और समृद्ध बनाती है। यही वजह है कि हरेली छत्तीसगढ़ के लोकजीवन, श्रम और सामुदायिक भावना का जीवंत प्रतीक बन गया है। 
🌾 नई पीढ़ी को संस्कृति से जोड़ने का अवसर
आधुनिकता के दौर में जब पारंपरिक जीवनशैली तेजी से बदल रही है, हरेली नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने का महत्वपूर्ण अवसर देता है। गेड़ी, पारंपरिक कृषि उपकरण, लोकगीत, ग्रामीण खेल और खेती से जुड़ी परंपराएं बच्चों को छत्तीसगढ़ की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत से परिचित कराती हैं।
🌳 प्रकृति संरक्षण का संदेश
हरेली का सबसे बड़ा संदेश है—प्रकृति का सम्मान और संरक्षण। खेत, जंगल, जल, पशुधन और पेड़-पौधे ग्रामीण जीवन के आधार हैं। इसलिए हरेली हमें याद दिलाता है कि समृद्धि केवल अच्छी फसल से नहीं, बल्कि स्वस्थ पर्यावरण और प्रकृति के संतुलन से भी जुड़ी है।
हरेली हमें सिखाता है कि किसान का पसीना, धरती की हरियाली और प्रकृति का आशीर्वाद—तीनों मिलकर जीवन को समृद्ध बनाते हैं।
💚 हरेली का संदेश
“हरियर धरती, खुशहाल किसान और समृद्ध छत्तीसगढ़—यही हरेली की पहचान है।”
छत्तीसगढ़ की माटी की खुशबू, खेतों की हरियाली, गेड़ी की उमंग और लोकपरंपराओं की मिठास से भरा यह पर्व हमारी सांस्कृतिक पहचान को पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवित रखने का संदेश देता है। अबूझ माटी की खुशबू और छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति को नमन।
हरेली तिहार के पावन अवसर पर सभी प्रदेशवासियों को हार्दिक शुभकामनाएं। 🌿🌾

